
भारत मे kala azar ऐसी बीमारी है जो हर साल काफी लोगो को अपना शिकार बनाती है। एक अध्ययन के अनुसार, हाल ही में बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से ही इस बीमारी के लगभग 339 cases सामने आये हैं । kala azar या काला बुखार एक जानलेवा बीमारी है जो लेशमैनिया परजीवी के कारण होती है और शरीर के अंगों में सूजन पैदा करती है। भारत, world health organization के साथ मिल कर इस जानलेवा बीमारी को पूरी तरह ख़तम करने का प्रयास भी कर रहा है और अब इस प्रयास मे अपनी भागीदारी दर्ज करवाई है आईआईटी BHU और आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओ ने।
दोनों संस्थानों के शोधकर्ताओ ने मिलकर kala azar के इलाज में एक बड़ी सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने “डुअल-टारगेट लिपोसोमल थेरेपी” विकसित की है, जो एक साथ दो जरूरी enzyme- आयरन सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेस ए (FeSODA) और ट्रिपैनोथिऑन रिडक्टेस (TryR) को रोकती है, जो लीशमैनिया डोनोवानी परजीवी के लिए जरूरी है। शोधकर्ताओ ने इस दवा को खास लिपोसोमले तकनीक से तैयार किया है जिससे यह शरीर मे सही जगह पर जाकर दोनों एंजाइमों को एक साथ निशाना बनाती है, जिससे यह परजीवी बहुत जल्दी कमजोर होकर खत्म हो जाता है।
प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में यह देखा गया कि ये लिपोसोमल यौगिक लेशमैनिया परजीवी की माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली को नुकसान पहुँचा कर उसे पूरी तरह से निष्क्रिय कर देते हैं। इससे न केवल यह परजीवी मर जाता है, बल्कि बीमारी के दोबारा फैलने की संभावना भी काफी कम हो जाती है। पारंपरिक दवाओं की तुलना में यह नई तकनीक कहीं अधिक प्रभावी और सुरक्षित साबित हुई है। इसके अलावा, इसकी लागत भी कम आ सकती है, जिससे समाज के हर वर्ग को इसका फायदा होगा।
शोधकर्ताओ के अनुसार यह दवा न केवल भारत बल्कि उन सभी देशों में फायदेमंद साबित हो सकती है जहाँ kala azar अब भी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। प्रयोगशाला आधारित परीक्षणों में इस तकनीक ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं। अब शोधकर्ता इसके विभिन्न चरणों के परीक्षण की तैयारी कर रहे हैं, अगर यह परीक्षण सफल रहते हैं, तो आने वाले कुछ वर्षों में यह दवा लोगों के लिए उपलब्ध हो सकती है।
Drug Delivery Science and Technology मे प्रकाशित यह अध्ययन केवल वैज्ञानिको की सफलता और उपलब्धि नहीं, बल्कि लाखों ज़िंदगियों के लिए नई उम्मीद है। कालाजार जैसी पुरानी और घातक बीमारी के इलाज में यह तकनीक एक बड़ा बदलाव ला सकती है।

