
आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने भूजल से ज़हरीले आर्सेनिक को हटाने के लिए कम लागत वाली और बेहतर इलेक्ट्रो-कोएगुलेशन-आधारित प्रणाली तैयार की है।
इलेक्ट्रो-कोएगुलेशन तकनीक में पानी में डाले गए, इलेक्ट्रोड के माध्यम से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है। जिससे धातु आयन निकलते हैं, जो आर्सेनिक जैसे प्रदूषकों से जुड़कर उन्हें गुच्छों या फ्लॉक में बदल देते हैं, जिनको आसानी से अलग किया जा सकता है।
परंपरागत EC प्रणालियों में स्थिर स्टेशनरी इलेक्ट्रोड का उपयोग होता रहा है, जिससे समय के साथ इलेक्ट्रोड की सतह पर जमाव बन जाता है, और दक्षता घटती है।
लेकिन आईआईटी गुवाहाटी की टीम के इलेक्ट्रो-कोएगुलेशन को रोटेटिंग इलेक्ट्रोड के साथ जोड़ा। इसमें नियंत्रित विद्युत धारा के माध्यम से लोहे का सैक्रिफिशियल एनोड घुलता है, और उसका घूमना मिश्रण और द्रव्यमान अंतरण को बढ़ाता है।
इससे लोहे के कोएगुलेंट का समान रूप से निर्माण होता है, जो पानी में मौजूद आर्सेनिक से प्रभावी रूप से जुड़ जाता है और गुच्छे बनाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, घूमने वाले लोहे के इलेक्ट्रोड के उपयोग से आर्सेनिक हटाने की दक्षता बढ़ती है और परिचालन लागत कम रहती है।
यह प्रणाली दूषित पानी से लगभग 99% आर्सेनिक कुछ ही मिनटों में हटा सकती है, और इसकी लागत लगभग 9 रुपये प्रति 1,000 लीटर बैठती है।
हालांकि यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर ही जांची गई है, परंतु शोधकर्ताओं के अनुसार यह सीमित बुनियादी ढांचे वाले इलाकों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है, जहां भूजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है।
साथ ही पारंपरिक ईसी प्रणालियों की तुलना में इससे कम स्लज यानि कीचड़ उत्पन्न हुआ और उसका जमाव तथा प्रबंधन भी अपेक्षाकृत आसान पाया गया। इसलिए यह प्रणाली उन इलाकों के लिए उपयुक्त है जहां लागत, मज़बूती, और संचालन की सरलता अहम होती है।

