
दवाइयाँ बीमारियों को ठीक करने में मदद करती हैं, लेकिन यह समझना आसान नहीं होता कि वे शरीर के अंदर किस तरह से काम करती हैं। कई बार दवाओं से साइड-इफेक्ट भी हो जाते हैं। ऐसे मे बीमारियों के लिए सही दवा बनाना और मरीज़ों को सही दवा देना doctors के लिए चुनौती बन जाता है।
इसी समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की है IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने। दरअसल, शोधकर्ताओं ने नैनोबॉडी तकनीक पर आधारित एक खास बायोसेंसर बनाया है। यह सेंसर बता सकता है कि कोई दवा शरीर के अंदर मौजूद बहुत अहम रिसेप्टर G-protein-coupled receptor यानि (GPCRs) को कब और कैसे सक्रिय करती है।
यह सेन्सर एक surveillance camera की तरह काम करता है। जब कोई दवा GPCR रिसेप्टर को छूती है और उसे सक्रिय करती है, तो receptor के पास एक खास प्रोटीन अरेस्टिन (arrestin) आकार जुड़ जाता है। जिसके बाद ये सेन्सर एक हल्की रोशनी जैसा संकेत पैदा करता है जिसे वैज्ञानिक आसानी से देखकर ये समझ जाते हैं की दवा ने रिसेप्टर को एक्टिव किया है। इस सेंसर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह रिसेप्टर को बदले बिना काम करता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक नई दवाइयों की खोज को आसान कर सकती है साथ ही उनके असर और साइड-इफेक्ट्स समझने में बहुत मदद कर सकती है। यही कारण है कि आईआईटी कानपुर की यह खोज चिकित्सा क्षेत्र के लिए अहम मानी जा रही है।

