सोचिए आप International Space Station पर रहने वाले एक एस्ट्रोनॉट हैं, जो लोअर अर्थ आर्बिट में पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि ऊपर से पृथ्वी को देखने का एहसास कैसा होगा? कैसा लगता होगा, जब हर 90 मिनट में एक नया दिन शुरू हो जाए, यानी आप 24 घंटे में 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त को देखे
“ऑर्बिटल” by सामंथा हार्वे, वही किताब है जो आपको यही रोमांचक अनुभव कराएगी और वो भी बिना धरती छोड़े…
यह कहानी है, छह अंतरिक्ष यात्रियों की, जो अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर रहते हैं। जब आप इसे पढ़ेंगे, तो आप जानेंगे कि एक एस्ट्रोनॉट के लिए “घर” क्या होता है, जब वो घर 400 किमी नीचे तैर रहा हो। आप समझेंगे कि कैसे वे रोज़ाना अपनी भाषा, संस्कृति, और समय के अंतर से ऊपर उठकर एक टीम बन जाते हैं।
ऑर्बिटल पढ़ते हुए आपको लगेगा कि आप भी स्पेस स्टेशन की खिड़की पर खड़े हैं। एस्ट्रोनॉट्स की दिनचर्या से जुड़ीं छोटी-छोटी बातें आपको जीवन को नए सिरे से देखने पर मजबूर कर देंगी। आप समझ पाएंगे कि धरती के महासागर, जंगल, और शहरों को ऊपर से देखना इंसान के दिल में कैसा बदलाव लाता है, और यह भी कि microgravity में आंख से निकले आंसू भी एक चुनौती बन सकते हैं!
यह किताब नासा और ईएसए के वैज्ञानिकों के इनपुट पर आधारित है, परंतु यह सिर्फ विज्ञान की किताब नहीं है। 2024 के बुकर प्राइज़ से नवाज़ी गई यह किताब वास्तव में हमें इंसानियत से जोड़ती है, हमें इंसान होने का मतलब समझाती है, और अपनी पृथ्वी से प्यार करना सिखाती है।
अगर आप भी प्रकृति, विज्ञान, और इंसानी रिश्तों के बीच का संबंध समझना चाहते हैं, तो ऑर्बिटल आपके लिए है। दूसरी भाषाओं के साथ यह किताब हिंदी और अंग्रेजी में भी उपलब्ध है। तो देर किस बात की? पढ़ने के लिए Orbital उठाइए और धरती से 400 किलोमीटर ऊपर स्पेस स्टेशन पर पहुंच जाइए!

