
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल दुनिया भर में हो रहा है। और AI के बढ़ते इस्तेमाल से बढ़ रहा है, डेटा सेंटर्स का विस्तार।
दरअसल, जब आप किसी एआई tool में कोई प्रश्न या प्रॉम्प्ट टाइप करते हैं तो यह सिर्फ आपके डिवाइस पर चलने वाला सॉफ्टवेयर नहीं होता। आपकी क्वेरीज़ प्रोसेस करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं विशाल और विशेष एआई डेटा सेंटर्स, जो सारा कठिन काम करते हैं। पर यह डेटा सेंटर्स पानी, बिजली और ज़मीन जैसे संसाधनों पर चलते हैं।
United Nations University Institute for Water, Environment and Health की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर सभी डेटा सेंटर्स को एक देश माना जाए, तो यह दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता होगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वर्तमान में डेटा सेंटर्स से हर साल, लगभग 18.9 करोड़ टन Carbon dioxide का उत्सर्जन होता है, जिसकी भरपाई 10 सालों में 3.2 अरब पेड़-पौधे उगाने से होगी!
पानी के इस्तेमाल की बात करें तो, पिछले साल डेटा सेंटर्स ने इतना पानी खर्च किया, कि उससे लगभग 18 लाख ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरे जा सकते थे। इसके अलावा डेटा सेंटर्स की बिजली ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इतनी ज़मीन चाहिए जो ग्रेटर लंदन के कुल क्षेत्रफल से लगभग 4.5 गुना ज्यादा है।
अनुमान है कि 2030 तक ये आँकड़े और भी चौंकाने वाले होंगे, जिसमें AI से जुड़ा पानी का इस्तेमाल लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर होगा। इसलिए अगली बार जब आप AI का इस्तेमाल करें, तो यह ध्यान रखें कि यह सिर्फ़ आपके फ़ोन में मौजूद एक वर्चुअल असिस्टेंट नहीं है, बल्कि एक फिज़िकल स्ट्रक्चर है जो हर प्रॉम्प्ट के साथ बिजली, पानी और ज़मीन जैसे संसाधनों का इस्तेमाल करता है।
इसलिए AI का इस्तेमाल सोच-समझकर करना ज़रूरी है। अपने सवाल छोटे और स्पष्ट रखें, एक ही काम के लिए बार-बार नए अनुरोध करने से बचें और पहले मिले जवाबों का दोबारा इस्तेमाल करें। ऐसे छोटे-छोटे बदलाव AI के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं।

