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UV-C रेडिएशन से बचाव का प्राकृतिक मॉडल: लाइकेन

 

Clavascidium lacinulatum

सबसे ताकतवर रोशनियों में से एक यूवी-सी यानि Ultraviolet-C रोशनी को सबसे खतरनाक माना जाता है, क्योंकि यह ज़्यादातर जीवों की cells को पल भर में खत्म कर देती है। यही वजह है कि इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल अस्पतालों में कीटाणुओं को मारने के लिए किया जाता है।

लेकिन हाल ही में एस्ट्रोबायोलॉजी जर्नल में छपे एक शोध के अनुसार वैज्ञानिकों ने पाया कि एक छोटा-सा जीव ऐसा भी है, जो इस खतरनाक रोशनी को सहन कर सकता है।

डेज़र्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने अपने फील्ड वर्क के दौरान अमेरिका के मोजावे रेगिस्तान में इस गहरे काले रंग का लाइकेन क्लेवेसिडियम लेसिन्यूलेटम (Clavascidium lacinulatum) देखा, जो तेज़ धूप और गर्मी में भी अच्छे से फल-फूल रहा था। लाइकेन दरअसल फफूंद यानि fungus और शैवाल यानि algae से मिल कर बनता है।

वैज्ञानिकों को लगा की शायद इसका काला रंग ही इसकी ताकत है। वैज्ञानिकों ने इसे लैब में लगभग तीन महीनों तक UV lamp की रोशनी में रखा, और इसे जब बाहर निकाल कर देखा गया तो पाया गया, कि इसमे ज्यातर शैवाल सेल्स अभी भी जीवित थीं, और दो हफ्तों में उन्होंने फिर से हरी कॉलोनी बना ली।

इसके अलावा यही प्रयोग सिर्फ शैवाल पर किया गया तो देखा गया की यह कुछ ही मिनटों में मर गए, जिससे साफ हुआ कि फफूंद, शैवाल की ढाल बनकर उसकी रक्षा करता है।

रिसर्च के दौरान यह भी सामने आया कि लाइकेन की ऊपरी परत में मौजूद खास रसायन यूवी रोशनी को सोख लेते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि लाइकेन्स में मौजूद यह सुरक्षा पृथ्वी के वातावरण से खुद को सुरक्षित रखने के लिए विकसित हुई होगी। और इसका उद्देश्य UV रोशनी से नहीं, बल्कि ऑक्सीजन के कारण होने वाले DNA नुकसान से बचाव करना है।

यह छोटा-सा लाइकेन दिखाता है, कि जीवन सबसे कठिन हालात में भी खुद को बचाने का रास्ता खोज ही लेता है।

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