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DU में फंगस पर राष्ट्रीय सम्मेलन: शोध और नवाचार ने खोले नए रास्ते

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फफूंदी, फंगस या कवक – हममें से ज़्यादातर लोग इसे हानिकारक समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि फंगस हमारी ज़िंदगी का एक साइलेंट हीरो है। ये फंगस ही थी जिसने इंसान को ज़िंदगी बचाने वाली दवा Penicillin दी। एक ऐसी एंटीबायोटिक जिसने आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की दिशा ही बदल दी।

कवक एक ऐसा जीव समूह है, जिसकी भूमिका हमारी ज़िंदगी में बेहद गहरी है। मिट्टी से लेकर हवा तक, पेड़ों की जड़ों से लेकर हमारे भोजन तक, यह हर जगह मौजूद है बिना शोर किए।
Antibiotic Penicillin जैसी ऐतिहासिक खोजों से लेकर मिट्टी को उपजाऊ बनाने तक, फंगस ने विज्ञान और समाज दोनों पर गहरा असर डाला है।

इसकी इसी भूमिका पर और ज़ोर देने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय बॉटेनिकल सोसाइटी और इंडियन माइकोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा 20 से 22 नवम्बर 2025 तक, दिल्ली विश्वविद्यालय में फंगी से जुड़े शोध, उनके उपयोग, पर्यावरण में उनकी भूमिका और उद्योगों में कवक के बढ़ते महत्त्व को लेकर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।

‘Fungi for Bharat’ यानि ‘भारत के लिए कवक’ थीम पर आयोजित इस सम्मेलन में देशभर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने फंगी की दुनिया को लेकर शोध तकनीकी नवाचारों और भविष्य की दिशा पर विचार साझा किए। इस दौरान अनेक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओ ने कृषि में जैव उर्वरक, पर्यावरण-अनुकूल कीट प्रबंधन, कवक आधारित औषधियां, जलवायु स्थिरता और औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों पर अपने शोधपत्र पेश किये।

कुल मिलाकर, इस राष्ट्रीय सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि फंगस सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित विषय नहीं, बल्कि भविष्य की कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण और उद्योग—सभी के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत, कवक से जुड़ी शोध क्षमताओं को और मज़बूत करे, तो यह छोटा सा जीव समूह आने वाले वर्षों में कई बड़े बदलावों की कुंजी बन सकता है।

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