
मेघालय के मावसिनराम इलाके में फैले घने और नमी से भरे बांस के जंगलों में, प्रकृति ने एक कहानी छुपा रखी थी। यह तब सामने आई, जब वैज्ञानिकों की नज़र सड़ते हुए बांस के तनों पर पड़ी।
खासी पहाड़ियों में एक सर्वे के दौरान, शोधकर्ता बांस के पुराने और टूटे हिस्सों का अध्ययन कर रहे थे, तभी उन्हें बांस पर कई छोटे-छोटे उभार दिखाई दिए। शोधकर्ताओं के अनुभव और बारीक नज़र ने यह पहचान लिया कि ये उभार एक फंगस की तरह प्रदर्शित हो रहे हैं। यहीं से इस खोज की शुरुआत हुई।
वैज्ञानिकों की जांच के दौरान पाया गया कि यह फंगस सभी कवक प्रजातियों से बिल्कुल अलग है। इसके डीएनए की जांच की गई, जिससे यह साफ हो गया कि ये फंगस किसी भी Genus (जी-नस) से मेल नहीं खाता।
वैज्ञानिकों ने इसको नाम दिया- पैरासिनमेलिसिया खासियाना (Parasynnemellisia khasiana), जो खासी पहाड़ियों की पहचान को अपने नाम में समेटे हुए है। इस अध्ययन से पता चला कि यह फंगस, एक ज्ञात कवक परिवार Phaeosphaeriaceae से संबंधित है, लेकिन है बिल्कुल अलग कवक।
वैज्ञानिक बताते हैं कि फंगस जंगलों के लिए ज़रूरी होते हैं। ये सूखे और मरे हुए पौधों को सड़ाकर उन्हें मिट्टी में मिला देते हैं, जिससे जंगल को पोषण मिलता है, और जीवन का चक्र चलता रहता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस खोज से संकेत मिलता है, कि इन जंगलों में अभी भी कई अनदेखी प्रजातियां छुपी हो सकती हैं।
इस नए फंगस के नमूनों को भारत के राष्ट्रीय फंगस और हर्बेरियम संग्रह में सुरक्षित रख दिया गया है, ताकि यह खोज हमेशा के लिए वैज्ञानिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाए।
इस खोज से यह भी साबित होता है कि जंगल सिर्फ जानवरों का घर नहीं हैं, बल्कि उन छोटे और अनदेखे जीवों का भी सहारा हैं, जो चुपचाप पूरे जंगल को जीवित और स्वस्थ बनाए रखते हैं।

