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दुर्लभ प्राकृतिक शर्करा D-tagatose के उत्पादन की नई जैविक विधि

 

D-tagatose molecules—sweet taste with fewer calories.

बच्चे हों या बुजु़र्ग, मीठा स्वाद हर किसी को ललचाता है।  लेकिन यही मिठास जब मोटापे और डायबिटीज़ की वजह से छोड़नी पड़ जाए.. तो जिंदगी भी फीकी लगने लगती है।

इसी मिठास को बरकरार रखने के लिए वैज्ञानिकों ने D- Tagatose नामक प्राकृतिक चीनी बनाने का एक नया तरीका विकसित किया है। टेगाटोज़ का स्वाद तो आम चीनी जैसा ही होता है, लेकिन Calories और Glycemic index आम चीनी के मुकाबले बहुत कम होते हैं। जिसके चलते यह ब्लड शुगर को तेज़ी से नहीं बढ़ाती।

दरअसल D- Tagatose प्रकृति में बहुत कम मात्रा में पायी जाती है, और इसे बनाने की मौजूदा औद्योगिक विधियाँ महँगी, अक्षम और रासायनिक अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली हैं। मौजूदा तकनीकें गैलेक्टोज़ पर निर्भर करती हैं, जो दूध में पाए जाने वाले लैक्टोज़ से निकाली गयी एक शर्करा है। चूंकि लैक्टोज़ में ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ बराबर मात्रा में होते हैं, इसलिए कच्चे माल का आधा हिस्सा लगभग बर्बाद हो जाता है।

परंतु नए तरीके में वैज्ञानिकों ने E. coli बैक्टीरिया की अंदरूनी रासायनिक मशीनरी को को इस तरह से बदला कि वे सस्ते Glucose से सीधे D- Tagatose बना सकें।

वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की एक प्राकृतिक प्रक्रिया Leloir Pathway को उलट दिया, जो आमतौर पर शुगर तोड़ती है। अब वही प्रक्रिया Glucose से Galactose बनाती है, और फिर एक enzyme की सहायता से Galactose, D- Tagatose में बदल जाता है।

इस प्रक्रिया की सबसे ख़ास बात रही कि यह पूरा काम ज़िंदा कोशिकाओं के अंदर होता है। जिसमें न ही शुद्ध एंजाइम्स की ज़रूरत पड़ती है, न ही खतरनाक रसायनों की, और न कोई भारी-भरकम औद्योगिक सेटअप की।

Cell Reports Physical Science में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, प्रयोगशाला परीक्षणों में संशोधित बैक्टीरिया ने लगभग 35% Glucose को Galactose में बदला और प्रति लीटर 1 ग्राम से अधिक Tagatose का उत्पादन किया।

इस प्रयास को मज़बूत शुरुआती सफलता माना जा रहा है। भविष्य में यह तकनीक ऐसी मिठास ला सकती है, जो स्वाद भी दे और सेहत को नुकसान भी न पहुँचाए।

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