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जानिए क्या थी नोबेल के पीछे की कहानी

हर साल अक्टूबर आते ही पूरी दुनिया का ध्यान जाता है नोबेल प्राइज पर।  कौन जीतेगा इस साल का नोबेल प्राइज़? किसके योगदान  को मिलेगा यह सम्मान ? टीवी, अख़बार और सोशल मीडिया पर बस एक ही ख़बर छाई रहती है —’ विभिन्न विषयों में नोबेल प्राइज के विनर्स का ऐलान’!

लेकिन क्या आपको पता है कि जिस पुरस्कार को आज दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान कहा जाता है, उसकी स्थापना की प्रेरणा मिली एक ग़लतफ़हमी से..

जी हाँ, आपने सही सुना —हमें यह तो पता है कि दुनिया के सबसे सम्मानित पुरस्कार ‘नोबल प्राइज़’की  स्थापना की थी वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल ने..,लेकिन इसके पीछे की सोच को जगाया एक ग़लतफ़हमी ने।

वैज्ञानिक प्रयोग का शौक़ रखने वाले अल्फ्रेड नोबेल के  पास थे 300 से भी ज़्यादा पेटेंट, पर उनका सबसे प्रसिद्ध आविष्कार रहा डायनामाइट, जिससे निर्माण कार्य बेहद आसान हो गए। लेकिन डायनामाइट का इस्तेमाल युद्ध और हथियार बनाने के लिए भी किया जाने लगा। और इससे होने वाले विनाश के लिए अल्फ्रेड नोबेल को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता।

ख़ैर आविष्कार तो हो चुका था और अल्फ्रेड अपनी जिंदगी जी रहे थे और काफ़ी धन-दौलत भी कमा चुके थे। पर एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि मरने के बाद लोग उन्हें कैसे याद करेंगे…

हुआ यूं कि 1888 में अल्फ्रेड नोबेल के बड़े भाई का फ्रांस में देहांत हो गया। और एक फ्रेंच अख़बार ने ग़लतफ़हमी के चलते अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु की ख़बर छाप दी, और हैडलाइन दी The Merchant of Death is Dead ..यानि मौत के व्यापारी की हुई मृत्यु !

जब अल्फ्रेड नोबेल ने यह हैडलाइन पढ़ी तो  उन्हें यह सोचकर धक्का लगा कि उनके वैज्ञानिक योगदान को भुलाकर दुनिया उन्हें मौत के सौदागर का नाम देगी.. बेशक उन्होंने डायनामाइट का आविष्कार किया था परंतु उसका सही या ग़लत इस्तेमाल तो दुनिया के हाथ में था..

इस घटना से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी वसीयत को बदला और अपनी दौलत का अधिकांश हिस्सा एक ट्रस्ट के नाम कर दिया, जिससे हर साल ऐसे ज्ञानवान लोगों को सम्मान मिले जो मानवता को उच्चतम लाभ पहुंचाएं। और इसी तरह 1895 में नोबेल प्राइज की नींव रखी गई।

पहली बार ये पुरस्कार 1901 में दिया गया — और तब से यह बन गया ‘दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान’

 

 

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