
चीन की Nanjing Forestry University और Tsinghua University के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक ‘पॉलीस्टाइरीन’ को टाल्यूईन (Toluene) में बदला जा सकता है।
पॉलीस्टाइरीन वही प्लास्टिक है, जिससे खाने-पीने के डिब्बे और पैकिंग बनती है, और प्लास्टिक कचरे में एक बड़ा भाग पॉलीस्टाइरीन ही होता है। जबकि टाल्यूईन एक महत्वपूर्ण औद्योगिक रसायन है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से पेंट, कोटिंग्स, चिपकने वाले पदार्थ, स्याही और क्लीनर में, सॉल्वेंट के रूप में फैक्ट्रियों और उद्योगों में होता है।
प्लास्टिक कचरे को छोटे अणुओं में परिवर्तित करने के लिए, यह तकनीक एक single reactor system पर आधारित है, जिसमें दो चरण होते हैं। पहले चरण में ठोस प्लास्टिक कचरे को उच्च तापमान पर गर्म करके वाष्प में बदला जाता है। जिसे पायरोलिसिस कहा जाता है।
फिर रिएक्टर के दूसरे भाग में वाष्प प्रवाहित होती है, जिसमें उत्प्रेरक और हाइड्रोजन गैस होती है। यहाँ, हाइड्रो-जेनोलिसिस होता है, जिसमें हाइड्रोजन गैस इन वाष्प के अणुओं में रासायनिक बंधनों को तोड़कर, उन्हें टाल्यूईन में बदल देती है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने सिंगल-एटम कैटेलिस्ट्स का इस्तेमाल किया, जो असरदार होने के साथ-साथ लंबे समय तक काम करते हैं। उनका कहना है, कि अगर कैटेलिस्ट को परमाणु स्तर पर सही तरीके से नियंत्रित किया जाए, तो प्लास्टिक से मनचाहा रसायन बनाया जा सकता है।
इस तकनीक से 99% से ज्यादा सिलेक्टिविटी के साथ पॉलीस्टाइरीन को टाल्यूईन में बदला जा सका और 83.5% तक टाल्यूईन की प्राप्ति हुई। अध्ययन से यह भी पता चला, कि इस तरीके से टाल्यूईन बनाने पर कार्बन उत्सर्जन 53% तक कम हो सकता है। इसकी लागत लगभग 0.61 डॉलर प्रति किलो है, जो मौजूदा उद्योग मानकों से नीचे है।
भविष्य में इस रिएक्टर को इस तरह बदला जा सकता है, कि पॉलीस्टाइरीन से दूसरे रसायन या ईंधन तैयार किए जा सकें। अगर यह तकनीक सफल होती है, तो प्लास्टिक प्रदूषण कम करने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद बन सकती है।

