
दुनिया भर में पानी की कमी ने अब एक गंभीर संकट का रूप धारण कर लिया है। हाल ही मे संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान (UNU-INWEH) की रिपोर्ट ने दुनिया में जल संकट की वर्तमान स्थिति को जल दिवालियापन का नाम दिया।
संस्थान के अनुसार ‘जल संकट’ और ‘जल की कमी’ जैसे शब्द अब विश्व की नई जल स्थिति का पर्याप्त वर्णन नहीं करते। क्योंकि दुनिया अब “वैश्विक जल दिवालियापन” के युग में प्रवेश कर रही है, जिसमें नदियाँ, झीलें और जलभंडार इतनी तेज़ी से सूख रहे हैं, की प्रकृति उनकी भरपाई नहीं कर पा रही।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की कुछ बड़ी झीलें सिकुड़ रही हैं, और ऐसी नदियों की संख्या बढ़ रही है, जो साल के कुछ महीनों में समुद्र तक नहीं पहुंच पाती।
पिछले 50 वर्षों में दुनिया भर में लगभग 41 करोड़ हेक्टेयर आर्द्रभूमि या वेटलैंड्स नष्ट हो चुकी हैं, जो क्षेत्रफल में लगभग पूरे यूरोपीय संघ के बराबर है।
इसके साथ लगभग 70% बड़े भूमिगत जल भंडार, जो पीने और खेती के लिए इस्तेमाल होते हैं, यह भी कम होते जा रहे हैं।
रिपोर्ट से पता चला, की 1970 से अब तक दुनिया की 30% से ज्यादा ग्लेशियर बर्फ पिघल चुकी है, जिससे उन करोड़ों लोगों को ख़तरा है, जो मौसमी पिघले पानी पर ही निर्भर रहते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सरकारों को अब पानी की कमी को कुछ समय की परेशानी नहीं, बल्कि लंबे समय की गंभीर चुनौती समझना होगा। क्योंकि समय पर निर्णय न लेने से भविष्य में परेशानियाँ और बढ़ सकती हैं।
इस रिपोर्ट को Water Resources Management पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है, कि कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर सुधार भी देखा जा रहा है। इसलिए पूरी दुनिया को एक साथ “जल दिवालिया” कहना सही नहीं होगा।

