
प्लास्टिक प्रदूषण से हम सब वाकिफ हैं। यहां-वहां पड़े प्लास्टिक की चीज़ों के ढेर न सिर्फ धरती को बल्कि जल स्रोतों को भी प्रदूषित कर रहे हैं। पर प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, नए शोध बता रहे हैं कि यह समस्या सीधे हमारे शरीर के भीतर, हमारी कोशिकाओं और हमारी आंतों के स्वास्थ्य तक को, बुरी तरह से प्रभावित कर रही है। और इसका एक बड़ा कारण हैं पॉलीइथिलीन टेराफ्थलेट यानि PET से बनी पानी और पेय पदार्थों की बोतलें।
ये समय के साथ टूटकर बेहद छोटे-छोटे प्लास्टिक कण छोड़ती है, जिन्हें नैनोप्लास्टिक्स कहा जाता है, और विशेषज्ञों के अनुसार ये इतने छोटे होते हैं कि हवा, पानी और खाने के ज़रिये आसानी से हमारे शरीर के अंदर पहुँच जाते हैं।
मोहाली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी यानि INST के वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए एक अध्ययन किया कि इन नैनोप्लास्टिक्स का हमारे Gut Microbes पर क्या प्रभाव पड़ता है?
यानी हमारी आंतों में रहने वाले सूक्ष्म जीव- जो हमारे पाचन, इम्यूनिटी, मेटाबॉलिज़्म और यहाँ तक कि मानसिक स्वास्थ्य को भी संतुलित रखते हैं- वो इन नैनोप्लास्टिक्स से कैसे जूझ रहे हैं?
वैज्ञानिकों ने लैब में PET प्लास्टिक बोतलों से नैनोप्लास्टिक्स तैयार किए और उनका असर तीन अलग-अलग सिस्टम पर देखा—गट बैक्टीरिया, रेड ब्लड सैल्स और मानव कोशिकाएँ।
अध्ययन के दौरान ये पता चला की फायदेमंद गट बैक्टीरिया लंबे समय तक नैनोप्लास्टिक के संपर्क में रहने पर कमज़ोर हो जाते हैं। उनकी बढ़ने की क्षमता कम होने लगती है।
और खून की जाँच से यह सामने आया कि ज़्यादा मात्रा में नैनोप्लास्टिक रेड ब्लड सैल्स की झिल्ली को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि लंबे संपर्क से DNA को नुकसान, ऑक्सीडेटिव तनाव, कोशिका मृत्यु, और सूजन भी बढ़ी।
अध्ययन का संदेश साफ़ है- प्लास्टिक का ख़तरा अब हमारे चारों ओर ही नहीं, बल्कि हमारे शरीर के अंदर भी बढ़ रहा है। एक सुरक्षित भविष्य के लिए अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो ये अदृश्य नैनोप्लास्टिक्स आने वाले सालों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकते हैं।

