
1986 में रूस के चेर्नोबिल में हुई परमाणु आपदा के बाद वैज्ञानिकों को लगा था कि वहाँ जीवन असंभव होगा, लेकिन एक साधारण सा काला फंगस यानी क्लैडोस्पोरियम स्फेरोस्पर्मम Cladosporium sphaerospermum ने उनकी सोच को बदल दिया।
यह न सिर्फ तेज़ रेडीऐशन में जीवित रहा बल्कि उन जगहों पर और अधिक फैलता दिखा जहाँ रेडीऐशन ज़्यादा थी। ये फंगस मेलेनिन नामक गहरे रंग के पिगमेंट से भरपूर होता है, और हमारे बाल, आंखों, और त्वचा का रंग तय करने में भी इस पिगमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक जैसे मेलेनिन हमारी त्वचा को ultraviolet radiation से बचाता है वैसे ही संभव है कि यह आयनाइज़िंग रेडिएशन से होने वाले नुकसान को भी कम करता हो, और अगर ऐसा है तो यह फंगस ऐसे मानव युक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हो सकता है जिनके अंतर्गत चांद या मंगल पर मानव बस्तियां बसाई जाएंगी।
ऐसे अभियानों के लिए स्पेस में मौजूद हानिकारक आयनाइज़िंग रेडिएशन बहुत बड़ी बाधा है और हर अंतरिक्ष यात्री के लिए पृथ्वी से भारी भरकम रेडिएशन, ढाल ले जाना भी बहुत बड़ा मसला है। पर अगर पृथ्वी से कुछ ऐसा ले जाया जा सके जो स्पेस में अपने-आप बढ़कर एस्ट्रोनॉट्स के लिए रेडिएशन शील्ड का काम करे तो बहुत बड़ी समस्या हल हो सकती है।
तो स्पेस रेडिएशन की मौजूदगी में इस फंगस के विकास को देखने के लिए वैज्ञानिकों ने इसे क्यूबलैब मॉड्यूल के अंदर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजा। पता चला कि पृथ्वी की तुलना में यह फंगस 21 फ़ीसदी ज़्यादा बढ़ा और इतना ज़रूर दिखा कि इसकी परत कुछ हद तक रेडीऐशन को ज़रूर रोकती है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में ऐसे फंगस या इनके मेलेनिन और बायोमास को चाँद या मंगल की मिट्टी के साथ मिलाकर “जीवित विकिरण ढाल” बनाई जा सकती है, जो खुद बढ़े और नुकसान होने पर खुद को ठीक भी कर ले।
इसके अलावा ऐसे पदार्थों से ग्रहों/उपग्रहों पर मानव बस्तियां बसाने के लिए दीवारें या फर्नीचर भी बनाया जा सकता है।
Frontiers in Microbiology जर्नल में छपा यह शोध अभी शुरुआती है, लेकिन अगर भविष्य मे परीक्षण सफल रहे तो अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए यह एक नया और हल्का विकल्प बन सकता है।

