
हमारे सौर मंडल के बाहर के तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों को एक्सोप्लैनेट कहा जाता है। 1992 में पहली बार एक्सोप्लैनेट मिलने की पुष्टि की गई थी और अब तक 6000 से ऊपर एक्सोप्लैनेट्स खोजे जा चुके हैं। इनके वायुमंडल के डेटा से न केवल हमारे सौरमंडल के बाहर, जीवन की संभावना के बारे में पता चल सकता है, बल्कि उन तारों के बारे में भी अहम जानकारी मिल सकती है, जिनका यह चक्कर लगाते हैं।
Exoplanets की पहचान तो बहुत सारे स्पेस मिशन कर सकते हैं, परंतु इनके वायुमंडल की संरचना के बारे में ठोस जानकारी इकट्ठा करने के लिए इनको लंबे समय तक मॉनिटर करने की ज़रूरत है। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए NASA ने एक छोटा परंतु शक्तिशाली सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा है, जिसका नाम है ‘पैंडोरा’। बीती 11 जनवरी को, SpaceX के मिशन Twilight (ट्वाइलाइट) के ज़रिए, इसे Sun-synchronous orbit (सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट) में स्थापित कर दिया गया।
पैंडोरा का लक्ष्य है चुने गए 20 एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडल का गहराई से अध्ययन करना ताकि इनके वायुमंडल में पानी और अन्य गैसों की मौजूदगी का पता लग सके। दरअसल जब कोई ग्रह अपने तारे के सामने से गुज़रता है, तो तारे की रोशनी में आने वाले हल्के बदलावों को मापकर, उस ग्रह के वायुमंडल की संरचना के बारे में पता चल सकता है। परंतु दिक्कत यह है कि एक ही तारे के कुछ एरिया ज़्यादा चमकदार होते हैं, और कुछ मंद, जैसे कि सन-स्पॉट्स। और रोशनी का यही अंतर, एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल डेटा को प्रभावित करता है। अगर अवलोकन उस समय के हैं, जब ग्रह सन-स्पॉट के सामने था, तो एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल का डेटा वास्तविकता से अलग दिख सकता है।
पैंडोरा ऐसी ही दिक्कतों को दूर करेगा। यह एक वर्ष में, लक्षित एक्सोप्लैनेट्स और उनके तारों के, कुल 10 अवलोकन अलग-अलग समय पर करेगा। हर एक अवलोकन 24 घंटे का होगा जिसमें यह visible light में तारे की चमक पर लगातार नज़र रखेगा और साथ ही infrared data भी इकट्ठा करेगा।
इससे तारे की रोशनी में होने वाले उतार-चढ़ाव और ग्रह से आने वाले असली संकेतों को अलग करना आसान हो जाएगा। इससे वैज्ञानिक James Webb Telescope से मिले डेटा में तारे की वजह से होने वाली गड़बड़ी को समझकर साफ कर पाएंगे। यानी Pandora, James Webb की खोजों को और ज़्यादा भरोसेमंद बनाने में मदद करेगा।

