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भारत के स्पेस अभियानों में निजी कंपनियों की बढ़ेगी भूमिका

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भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में जल्द बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। IN-SPACe के चेयरमैन डॉ. पवन गोयनका के अनुसार, ISRO अब धीरे-धीरे रॉकेट और सैटेलाइट बनाने का काम निजी कंपनियों को सौंपकर, अपना पूरा ध्यान भविष्य के लिए उन्नत तकनीकें विकसित करने, अंतरिक्ष अभियान तैयार करने, और नई अंतरिक्ष सुविधाएं विकसित करने में लगाएगा।

इसरो Small Satellite Launch Vehicle (SSLV) की तकनीक और निर्माण की जिम्मेदारी Hindustan Aeronautics Limited (HAL) को पहले ही दे चुका है। और अब तैयारी है कि PSLV और LVM3 के निर्माण की ज़िम्मेदारी निजी कंपनियों को दी जाए। इस बदलाव का मक़सद भारत की स्पेस इकॉनमी को साल 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंचाना है।

दरअसल स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी और कमर्शियल स्पेस एक्टिविटीज़ को बढ़ाने के लिए, भारत सरकार ने जून 2020 में ही अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया था।

इसी उद्देश्य से IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorisation Centre) बनाया गया। यह अंतरिक्ष विभाग के तहत काम करने वाली एक सिंगल-विंडो एजेंसी है, जो निजी कंपनियों को अंतरिक्ष से जुड़े काम करने की मंज़ूरी देती है, और उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करती है।

इसी के फलस्वरुप, स्काई रूट एयरोस्पेस ने, कुछ ही दिनों पहले भारत के पहले निजी तौर पर विकसित रॉकेट विक्रम 1 को सफलतापूर्वक लांच किया था। डॉ गोयनका के अनुसार भारत में लगभग 450 स्पेस स्टार्टअप काम कर रहे हैं। जिनमें से 20 स्टार्टअप जल्द ही अलग-अलग तरह के कमर्शियल स्पेस अभियानों के लिए तैयार हो सकते हैं।

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