पेड़-पौधों से भरे जंगल, धरती पर पाए जाने वाले जीवन के लिए एक सुरक्षा-चक्र का काम करते हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि हर छोटे-बड़े तनाव से गुज़रने के बाद एक जंगल कितनी जल्दी सामान्य होता है।
इसलिए वैज्ञानिक सैटेलाइट डेटा से जंगलों की सेहत पर नज़र रखने के लिए ‘टेम्पोरल ऑटो-कोरिलेशन’ (TAC) नामक एक तकनीक का इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन अब तक इसके इस्तेमाल का ना तो कोई तय तरीक़ा था, और ना ही यह ज़मीनी हक़ीक़त से जुड़ा हुआ था। अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कनेक्टिकट के वैज्ञानिकों ने TAC के इस्तेमाल से जुड़ी इन्हीं कमीयों को दूर किया है।
शोधकर्ताओं ने Nature Ecology & Evolution में प्रकाशित अपने अध्ययन में बताया कि TAC सीधे हरेपन को नहीं देखता, बल्कि मौसमी बदलाव के बाद बचे हुए छोटे-छोटे संकेतों का विश्लेषण करता है।
ये संकेत बताते हैं कि छोटी-मोटी परेशानी के बाद जंगल कितनी जल्दी खुद को संभाल पाता है। यानी डेटा में जो शोर जैसा दिखता है उसमें ही जंगलों की मज़बूती के असली संकेत छुपे होते हैं। इसलिए TAC से सटीक जानकारी हासिल करने के लिए सही समय, सही फ्रीक्वेंसी और सही वनस्पति संकेतक चुनना बहुत ज़रूरी है। साथ ही उन्होंने सैटेलाइट डेटा को अमेज़न के जंगलों में किए गए ज़मीनी सर्वे से भी जोड़ा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तरीक़ा उन जंगलों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो अपने टिप्पिंग प्वाइंट (tipping point) पर पहुंच रहे हों, यानी वो बिंदु जहां एक छोटी सी प्रतिकूल स्थिति भी जंगल को दोबारा सामान्य होने से रोक सकती है।

