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IIT कानपुर ने निकाली डिप्रेशन की सही दवा चुनने की विधि

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डिप्रेशन या अवसाद, दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है। इसमें मरीज़ लंबे समय तक उदासी, निराशा और किसी काम में रुचि न होने जैसी समस्याओं का सामना करता है।

इसके इलाज के लिए साइकोलॉजिकल परामर्श के साथ एंटी-डिप्रेसेंट दवाएं दी जाती हैं। लेकिन यह पता लगाने में आमतौर पर 4 से 6 हफ्ते लग जाते हैं कि दी गई दवा मरीज़ पर असर कर भी रही है या नहीं?

इसी समस्या को हल करने की कोशिश की है IIT कानपुर और गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने, अपनी नई स्टडी में…

अध्ययन के अनुसार, इलाज शुरू होने से पहले और उसके कुछ दिनों बाद मरीज़ के नैदानिक लक्षणों के साथ, उसके मस्तिष्क और पेट की गतिविधि जानने से यह समस्या हल हो सकती है।

अध्ययन में लगभग 206 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें करीब 144 डिप्रेशन के मरीज़ थे, जिन्होंने इससे पहले कोई इलाज नहीं करवाया था।

शोधकर्ताओं ने इलाज शुरू होने से पहले, और इलाज के एक हफ्ते बाद, Electroencephalogram (EEG) और Electrogastrogram (EGG) द्वारा इन मरीज़ों के मस्तिष्क और पेट के इलेक्ट्रिकल सिग्नल रिकॉर्ड किए। फिर इनके अध्ययन के नतीजों को मरीज़ के नैदानिक लक्षणों के साथ जोड़ा गया।

इस मॉडल ने 84% सटीकता के साथ यह पता लगाने में मदद की, कि किन मरीज़ों पर दवा असर नहीं करेगी। और जब इसे दूसरे मरीज़ों पर आज़माया गया, तो मॉडल ने 77.3% मामलों में सही नतीजे दिए।

शोधकर्ताओं का कहना है, कि यह तकनीक भविष्य में डिप्रेशन से पीड़ित मरीज़ों के लिए सही और व्यक्तिगत इलाज चुनने में मदद कर सकती है। हालांकि इसकी पुष्टि के लिए अभी बड़े स्तर पर और शोध की ज़रूरत है।

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