दिल्ली की हवा पर प्रदूषण का संकट कोई नई बात नहीं है। धुंध, धूल और ज़हरीली गैसों से भरे इस शहर में बसने वालों के लिए सांस लेना तो पहले ही आसान नहीं था और अब शोधकर्ताओं ने दिल्ली की हवा में माइक्रो प्लास्टिकस का भी खुलासा किया है।
जी हां, पुणे के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी (IITM) और Savitribai Phule Pune University द्वारा किए गए एक शोध के अंतर्गत, सर्दी और गर्मी के दौरान, दिल्ली के विभिन्न स्थानों से हवा के नमूने किए गए। और जब इनकी जांच शुरू की तो पता चला की इकट्ठा किए गए नमूनों मे कुल 2,087 माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद हैं। जिसमें सबसे अधिक मात्रा पौलिथीन और प्लास्टिक के कण पाये गए है जिसका इस्तेमाल पानी की बोतलें और पैकेजिंग और मे किया जाता है।
इतना ही नहीं, अध्ययन में यह बात भी सामने आई की सर्दियों के मुक़ाबले गर्मियों में, हवा में माइक्रो प्लास्टिकस की संख्या बढ़ कर दोगुना हो जाती है। जिससे bronchitis (ब्रोंकाइटिस), निमोनिया और फेफड़ों में सूजन जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा बढ़ना कोई हैरानी की बात नहीं है।
इस अध्ययन से इतना तो साफ़ हो गया है कि दिल्ली में लोग जहाँ भी सांस ले रहे हैं, उनके फेफड़ों तक प्लास्टिक पहुँच रहा है, फिर चाहे वे बड़े हों या बच्चे. अब सवाल यह है कि क्या हम समय रहते इस ख़तरे को रोक पाएंगे?? या आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस लेना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा?

