
हिमालय की ऊंचाई पर बनी ग्लैसियर झीलें जितनी सुंदर होती है उतनी खतरनाक भी। अगर इनमें जमा पानी अचानक से बेकाबू हो जाए तो बेहद तेज़ बाढ़ ला सकता है, जो गाँव, सड़कें, पुल और खेती को कुछ ही मिनट मे तबाह कर सकती है। समस्या ये है कि ऐसी आपदा अचानक आती है, इसलिए जरूरी है की इस खतरे को समय रहते पहचान लिया जाए।
इसी मकसद से नागालैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जेएनयू और सिक्किम यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र और उत्तर सिक्किम के लाचुंग बेसिन की झीलों की गहराई का बैथीमेट्रिक सर्वे करके, कंप्यूटर से 2D और 3D flood मॉडल तैयार करेंगे। बैथिमेट्रिक सर्वे जल के भीतर की स्थलाकृति की गहराई और आकार का विस्तृत मानचित्रण करते हैं।
शोधकर्ता इस उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा का उपयोग करके ये समझेंगे कि झीलों के आसपास कि ज़मीन की बनावट कैसी है, वहां बर्फ की परत कितनी कमजोर हो रही है और पहाड़ों की ढलान की स्थिति कैसी है ?
अनुसंधान के परिणामों को नीति निर्माताओं, योजनाकारों और विकासकर्ताओं के साथ साझा किया जाएगा ताकि नदियों और नालों के किनारे समग्र विकास किया जा सके। शोधकर्ताओ का मानना है की इस परियोजना के ज़रिए संभावित खतरनाक झीलों से होने वाले खतरों की पहचान पहले से हो सकेगी, जिससे लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और भारी नुकसान रोका जा सकता है।

