
चिकित्सा और भौतिकी के बाद 8 october यानि आज, रसायन विज्ञान के क्षेत्र में Nobel पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा की गई। इस बार का पुरस्कार जापान के सुसुमु कितागावा, ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड रॉबसन और अमेरिका के उमर याघी को मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स (MOFs) के विकास के लिए मिला है।
मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स एक ऐसी सूक्ष्म रासायनिक संरचना है जो दिखने में जाल जैसी होती है। इसमें बहुत सारी खाली जगहें या छोटे-छोटे कमरे बने होते हैं। इन कमरों के बीच से गैसें और तरल पदार्थ आसानी से अंदर-बाहर जा सकते हैं। इन फ्रेमवर्क्स में धातु के आयन (Metal ions) का इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें कार्बन आधारित अणुओं से जोड़ा जाता है। इससे ये एक प्रकार का क्रिस्टल का रूप ले लेती हैं।
सबसे पहले 1989 में रिचर्ड रॉब्सन ने तांबे के आयन और कार्बन से बने अणुओं को मिलाकर एक नई तरह का क्रिस्टल बनाया मगर वो मज़बूत नहीं था। जिसके बाद सुसुमु कितागावा और ओमार याघी ने इस तकनीक को और बेहतर बनाया।
कितागावा ने दिखाया कि इन ढाँचों में गैसें अंदर-बाहर जा सकती हैं, जबकि याघी ने इसे मज़बूत और टिकाऊ बना दिया। याघी ने यह भी साबित किया कि इन फ्रेमवर्क्स को डिज़ाइन करके इन्हें अलग-अलग कामों के लिए भी तैयार किया जा सकता है।
आज दुनिया भर में वैज्ञानिक दसियों हज़ार तरह के MOFs बना चुके हैं। कुछ MOFs ऐसे हैं जो पानी से हानिकारक रसायन को निकाल सकते हैं, तो कुछ प्रदूषण कम करने और स्वच्छ ऊर्जा बनाने में काम आ रहे हैं। इन ढाँचों की मदद से हवा से पानी इकट्ठा करना, कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करना, विषैली गैसों को सुरक्षित रखना, या महत्वपूर्ण रासायनिक प्रतिक्रियाएँ कराना — सब कुछ संभव हो सकता है।

