
मुंबई की फार्मा कंपनी वॉकहार्ट ने इतिहास रच दिया है। कंपनी द्वारा पूरी तरह से भारत में विकसित एंटीबायोटिक ज़ैनिक को US की रेगुलेटरी अथॉरिटी FDA से मंज़ूरी मिल गई है।
इस उपलब्धि के साथ, ‘वॉकहार्ट’, FDA-मंज़ूरी वाली दवा की खोज करने, उसे विकसित करने, और उसका मालिकाना हक़ रखने वाली पहली भारतीय फ़ार्मा कंपनी बन गई है। भारत CDSCO ने भी इसके आयात और मार्केटिंग को मंजूरी दे दी है।
ज़ैनिक एक इंट्रावेनस इंजेक्शन-आधारित एंटीबायोटिक है, जिसे ‘सुपरबग्स’ यानी दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को मारने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह दवा खासतौर पर complicated UTI और किडनी संक्रमण के इलाज के लिए बनाई गई है।
इस दवा को विकसित करने में कंपनी को लगभग 15 साल लगे। वॉकहार्ट के वैज्ञानिकों ने 2011 में ज़िडेबैक्टम नाम का एक नया मॉलिक्यूल बनाया और उसे पहले से मौजूद एंटीबायोटिक के साथ कंबाइन किया।
आमतौर पर इस क्लास की एंटीबायोटिक्स एक बैक्टीरिया प्रोटीन को टारगेट करती हैं, परंतु ज़ैनिक को एक साथ तीन तरह के बैक्टीरियल प्रोटीन को टारगेट करने के लिए बनाया गया।
लगभग एक दशक चले इसके क्लिनिकल ट्रायल्स ने बहुत अच्छे नतीजे दिए। फेज़-3 ENHANCE-1 ट्रायल में ज़ैनिक लेने वाले 89% मरीज़ ठीक हुए, जबकि मेरोपेनम लेने वालों में यह आंकड़ा 68.4% था।
ज़ैनिक पहली ‘न्यू केमिकल एंटिटी’ है, जो पूरी तरह भारतीय फार्मा कंपनी द्वारा विकसित होकर FDA से पास हुई है। हालांकि चेन्नई की द्वारा बनाया गया एनमेटाज़ोबैक्टम भी FDA-मंज़ूरी प्राप्त NCE की श्रेणी में आता है, लेकिन इसके डेवलपमेंट और कमर्शियलाइज़ेशन के लिए इसे एक जर्मन बायोटेक कंपनी को लाइसेंस दिया गया था।
विशेषज्ञों का मानना है, कि ज़ैनिक की ग्लोबल मार्केट 9 बिलियन डॉलर की है और ये AMR की लड़ाई में गेम-चेंजर साबित होगी।

