
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन से पता चला है, कि दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी की मछलियों में, हरियाणा के ऊपरी हिस्से की मछलियों के मुकाबले कहीं ज़्यादा माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। सबसे हैरानी की बात यह है कि जांच की गई हर मछली में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया।
वैज्ञानिकों ने यमुनानगर, करनाल, सूर घाट और सोनिया विहार से 12 तरह की लगभग 220 मीठे पानी की मछलियों का अध्ययन किया। इस दौरान मछलियों में कुल 1,678 माइक्रोप्लास्टिक मिले।
दिल्ली में यमुना नदी का हिस्सा सबसे ज़्यादा प्रदूषित मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि सीवर का गंदा पानी, घरों और फ़ैक्ट्रियों का कचरा, बारिश के पानी के साथ बहकर आने वाला प्लास्टिक और नदी में डाला जाने वाला कचरा इसकी बड़ी वजह है।
वैज्ञानिकों को सबसे ज़्यादा माइक्रोप्लास्टिक तिलापिया मछली में मिला और सबसे कम करनाल की नीडल फिश में पाया गया। सबसे ज़्यादा माइक्रोप्लास्टिक मछलियों के पेट और पाचन तंत्र में पाए गए। इसके अलावा ये छोटे कण मछलियों के गलफड़ों और मांस वाले हिस्सों तक भी पहुंच चुके थे। यानी मछली का खाने वाला हिस्सा भी अब सुरक्षित नहीं है।
अध्ययन में मिले लगभग 78% माइक्रोप्लास्टिक धागे जैसे छोटे-छोटे रेशों की तरह थे। लैब टेस्ट में 10 प्रकार के प्लास्टिक की पहचान हुई, जिनमें Polyethylene और Polypropylene सबसे ज़्यादा थे।
ज़ाहिर है कि लगातार बढ़ रहा प्रदूषण मछलियों और नदी के दूसरे जीवों के लिए गंभीर ख़तरा बन चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह ज़रूरी है कि यमुना नदी को बचाने के लिए गंदे पानी को साफ़ करके ही नदी में छोड़ा जाए। साथ ही नदी की नियमित जांच हो और प्लास्टिक कचरे को नदी में जाने से रोका जाए।

