अंतरिक्ष में बड़े स्पेस स्टेशन और फैक्ट्रियां बनाने का सपना अब हक़ीक़त के और करीब पहुंच गया है। हाल ही में बेंगलुरु की स्पेस स्टार्टअप Akashalabdhi Space ने एक ऐसी तकनीक का सफल परीक्षण किया है, जिसकी मदद से छोटे आकार में भेजे गए ढांचों को अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद बड़ा किया जा सकेगा।
कंपनी ने 3 नवंबर 2026 को High-altitude balloon की मदद से, लगभग 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर, 250 लीटर क्षमता वाले एक एक्सपेरिमेंटल ढांचे का परीक्षण किया। 25 किलोग्राम के इस प्रयोग को हैदराबाद स्थित Tata Institute of Fundamental Research (TIFR) की National Balloon Facility से उड़ाया गया।
आमतौर पर अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले ढांचे काफी बड़े होते हैं। लेकिन इस तकनीक में ढांचे को लॉन्च के समय छोटे आकार में पैक किया जा सकता है और अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद इसे फैलाकर बड़ा किया जा सकता है।
इसकी ख़ासियत यह भी है कि यह फैलने के बाद सख़्त बन जाता है, ताकि यह अपने आकार को बनाए रखे। परीक्षण के दौरान ढांचे के खुलने, फैलने और सख़्त होने के साथ बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा भेजने वाले सिस्टम की जांच भी की गई।
इस प्रयोग में दो रिसर्च पेलोड भी शामिल थे, जो उड़ान के दौरान नियर स्पेस कंडीशंस में रहे। एक था IISc बेंगलुरु का Microbial Regolith Experiment (MRX), और दूसरा एक Swiss कंपनी का एक्सपेरिमेंटल पेरोव्स्काइट सोलर-सेल डिवाइस।
30 किलोमीटर की ऊंचाई पर गुब्बारे की उड़ान… ऑर्बिटल वैक्यूम, लगातार माइक्रोग्रैविटी, या स्पेस रेडिएशन जैसा माहौल तो नहीं देती, पर फिर भी इस ऊंचाई पर बेहद कम एटमॉस्फेरिक प्रेशर और टेंपरेचर, space technologies को एक बीच का टेस्टिंग माहौल ज़रूर प्रदान करते हैं।
आकाशलब्धि स्पेस की योजना- ऑर्बिटल डेमोंस्ट्रेशन से पहले, इस परीक्षण से मिले आंकड़ों के आधार पर अपनी तकनीक को और बेहतर बनाने की है।

