
दुनियाभर में बढ़ते प्लास्टिक कचरे को कम करने के लिए इसकी रीसाइक्लिंग पर ज़ोर दिया जा रहा है…प्लास्टिक प्रदूषण कम करने के लिए यह प्रयत्न अच्छा भी है, परंतु विशेषज्ञों के अनुसार यह देखना भी निहायती ज़रुरी है, कि रीसाइकिल्ड प्लास्टिक का इस्तेमाल कहां और कैसे किया जा रहा है?
संयुक्त राष्ट्र की संस्था Food and Agriculture Organization की नई रिपोर्ट के अनुसार, फूड पैकेजिंग में रीसाइकिल्ड प्लास्टिक का इस्तेमाल चिंताजनक है क्योंकि रीसाइकिल्ड प्लास्टिक में हानिकारक रासायन और गंदगी हो सकती है जो खाद्य सुरक्षा के लिहाज़ से एक बड़ा ख़तरा है।
रिपोर्ट के अनुसार, मकई, गन्ने और कसावा से बने बायो-प्लास्टिक भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि उनमें भी कीटनाशक और एलर्जी पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं। इसके अलावा नई पैकेजिंग में इस्तेमाल किए जा रहे नैनोमैटेरियल्स के प्रभावों को लेकर हमारी जानकारी अभी भी अधूरी है।
इसलिए FAO का कहना है, कि खाद्य पदार्थों में रीसाइकिल्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल के लिए वैश्विक स्तर पर कड़े नियमों और दिशा-निर्देशों की ज़रूरत है। इसके साथ-साथ लगातार वैज्ञानिक निगरानी रखना भी उतना ही आवश्यक है।
आजकल पैकेजड फूड जैसे चिप्स, जूस, कोल्ड ड्रिंक्स और रेडी-टू-ईट फूड का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है, और यही वजह है कि इन सभी चीजों की मांग के साथ फूड पैकेजिंग का बाज़ार भी तेज़ी से फैल रहा है। एक दूसरी रिपोर्ट से पता चला है, कि इसी फूड पैकेजिंग से हर साल लगभग 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक खाने-पीने की चीजों में पहुंच रहा है।
FAO का कहना है, कि रिसाइक्लिंग करना ज़रूरी है, लेकिन इसे सुरक्षित तरीके से लागू करना होगा। और इसके लिए बेहतर कचरा छंटाई, सख़्त नियम और ज्यादा वैज्ञानिक रिसर्च की लगातार ज़रूरत है।

