भारत ने फ्यूज़न एनर्जी अनुसंधान में एक और उपलब्धि जोड़ ली है। गुजरात स्थित प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान ने, अपने SST-1 टोकामैक पर नया 82.6 गीगाहर्ट्ज़, 400 किलोवाट का जायरोट्रॉन स्थापित किया है।
SST-1 यानी स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामैक, भारत की ‘कृत्रिम सूर्य’ बनाने की प्रयोगशाला है। यह डोनट के आकार की मशीन सूर्य जैसी प्रक्रिया यानी न्यूक्लियर फ्यूज़न को धरती पर दोहराने की कोशिश करती है।
जायरोट्रॉन इसमें अहम भूमिका निभाता है। यह एक विशेष माइक्रोवेव जनरेटर है, जो इलेक्ट्रॉन साइक्लोट्रॉन रेजोनेंस हीटिंग (ECRH) तकनीक से प्लाज़्मा को गर्म करता है।
लगाया गया नया सिस्टम 400 किलोवाट पावर, 500 मिलीसेकंड तक दे सकता है। Institute for Plasma Research यानी IPR में पहले से मौजूद 42 गीगाहर्ट्ज़ सिस्टम के साथ मिलकर यह अब प्लाज़्मा को दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर गर्म करने में सक्षम होगा।
IPR के वैज्ञानिक पहले ही 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाला प्लाज़्मा बना चुके हैं। जहां सूर्य के केंद्र का तापमान करीब 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस है, वहीं हमारा प्रयोग सूर्य से 13 गुना ज़्यादा गर्म है।
इतनी गर्मी बना लेना ही काफी नहीं, बल्कि इस गर्मी को नियंत्रित करते हुए, एक सीमित क्षेत्र में स्थिर रखना ही असली चुनौती है। जहां सूर्य अपने भारी गुरुत्वाकर्षण से प्लाज़्मा को संभाले रखता है, वहीं टोकामैक को यह काम शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों से करना पड़ता है ताकि 20 करोड़ डिग्री डिग्री सेल्सियस की यह आग मशीन की दीवारों को न पिघला दे।
नया जायरोट्रॉन इसी हीटिंग और स्थिरता की चुनौती को सुलझाने में एक अहम कदम है, जो भविष्य की स्वच्छ और असीमित ऊर्जा का रास्ता खोलेगा।

