
अल्ज़ाइमर्स और पार्किंसंस जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसॉर्डर्स के इलाज की दिशा में, अमेरिका के बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ने एक नई सफलता हासिल की है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसा तरीका खोजा है, जिससे इन दिमाग़ी बीमारियों का इलाज आसान भी हो सकता है और बेहतर भी।
Nature Communications जर्नल में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है, कि ट्यूबलिन नाम का एक प्रोटीन दिमाग़ में बनने वाले हानिकारक Protein Clumps यानी प्रोटीन के गुच्छों को बनने से रोक सकता है।
आमतौर पर अल्ज़ाइमर्स और पार्किंसंस में टाऊ और अल्फा-सिन्यूक्लिन नाम के प्रोटीन अपना आकार खो देते हैं, और आपस में चिपककर गुच्छे बना लेते हैं। यही ‘गुच्छे’ मस्तिष्क के सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे याददाश्त धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगती है।
वैज्ञानिकों ने इस नए शोध में पाया, कि जब दिमाग़ में ट्यूबलिन सही मात्रा में मौजूद होता है, तब टाऊ और अल्फा-सिन्यूक्लिन गुच्छे नहीं बना पाते। इसके बजाय वो माइक्रोट्यूब्यूल्स बनाने में मदद करते हैं, जो सेल्स के अंदर जरूरी चीज़ों को पहुंचाने और उनकी बनावट को मज़बूत बनाए रखने का काम करते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है, कि अगर भविष्य में ट्यूबलिन का स्तर सुरक्षित तरीके से बढ़ाया जा सके, तो दिमाग़ में नुक़सान पहुंचाने वाले प्रोटीन के गुच्छों को बनने से रोका जा सकता है।
यह खोज अल्ज़ाइमर्स और पार्किनसन्स जैसी बीमारियों के बेहतर और नए इलाज विकसित करने करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

