
पेड़ जीवन के लिए वरदान हैं। जंगल हो, गांव हो, या शहर, प्रकृति के बनाए हुए ये कार्बन कैप्चर सिस्टम फोटोसिंथेसिस करते हुए कार्बन को सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
पर उन जगहों का क्या.. जहाँ प्रदूषण और कार्बन तो भारी मात्रा में उत्पन्न होते हैं, पर पेड़ लगाने की गुंजाइश ही नहीं होती… जैसे औद्योगिक कारखाने, रिफाइनरी, या गाड़ियों और भीड़-भाड़ से भरे बाज़ार।
इसी समस्या को देखते हुए भोपाल के मशरूम वर्ल्ड ग्रुप ने एलगी ट्री नामक एक इन्नोवेटिव डिवाइस विकसित किया है, जिसे ऐसी लोकेशन्स पर आसानी से लगाया जा सकता है जहां पेड़ लगाने की ना तो जगह होती है, और ना ही वातावरण।
भारत का पहला commercialized microalgae-based CCUS device, वास्तव में सोलर एनर्जी से चलने वाला 600 लीटर का बायो-रिएक्टर है, जिसमें पानी और microalgae का इस्तेमाल होता है।
जहां एक पेड़ को पनपने के लिए काफ़ी जगह और समय चाहिए, वहीं ये सूक्ष्म शैवाल बहुत कम जगह में पनपते हुए एक आम पेड़ से 50 गुना तेज़ी से Photosynthesis करते हैं।
इसलिए जब Algae tree प्रदूषित हवा खींचता है तो microalgae फोटोसिंथेसिस करते हुए CO2 का प्रयोग करते हैं और ऑक्सीजन बनाते हैं। साथ ही 15 मीटर के दायरे में PM2.5 जैसे ख़तरनाक कणों को भी 45-55% तक कम कर देती है।
एलगी ट्री की एक यूनिट साल में लगभग 1.5 टन CO2 सोखती है, यानी 25 बड़े पेड़ों के बराबर। परंतु यह डिवाइस पेड़ों का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक है। इसलिए इसे ऐसी जगहों पर लगाया जा रहा है जहाँ पेड़ नहीं लग सकते। जैसे भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क, IOCL गुजरात रिफाइनरी, वडोदरा और महाराष्ट्र के अमनोरा पार्क में।
यह इन्नोवेटिव डिवाइस बिना जगह घेरे, तुरंत कार्बन कैप्चर का काम शुरू कर सकता है। इसलिए इसका इस्तेमाल भारत के 2070 Net-Zero लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सहायक होगा।

