fbpx
News Research

बढ़ते CO₂ का असर: बदल सकती है गेहूं के प्रोटीन की गुणवत्ता

Featured Video Play Icon

जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन से पता किया है कि वातावरण में लगातार बढ़ता हुआ CO2 कंसंट्रेशन, किस तरह गेहूं की गुणवत्ता, यानी उसके प्रोटीन्स को प्रभावित कर सकता है।

दरअसल, क्लाइमेट चेंज की वजह से, एटमॉस्फियर में ग्लोबल CO₂ कंसंट्रेशन लगातार बढ़ रहा है। और 2050 तक CO2 की कंसंट्रेशन लगभग 600 ppm तक बढ़ने की आशंका है। ज़ाहिर है कि आगे चलकर गेहूं भी ऐसे ही वातावरण में उगेगा।

इसलिए यह देखने के लिए कि ज़्यादा CO₂ कंसंट्रेशन गेहूं के प्रोटीन कंपोज़िशन को कैसे प्रभावित कर सकता है, वैज्ञानिकों ने खेत में गेहूं की 10 किस्में उगाईं।

जिसमें कुछ पौधे कार्बन डाइऑक्साइड के बड़े हुए लेवल के संपर्क में रखे गए (546 पार्ट्स पर मिलियन) और बाक़ी पौधों को सामान्य हालात में रखा गया।

गेहूं की कटाई के बाद जब शोधकर्ताओं ने गेहूं में मिलने वाले अलग-अलग प्रोटींस की जांच की तो उन्हें पता चला कि ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड लेवल से कुछ प्रोटीन बढ़ गए, और कुछ प्रोटीन घट गए और कुछ में बदलाव आ गए। जैसे गेहूं में पाया जाने वाला ग्लूटेन प्रोटीन कम हो गया।

Gluten वही प्रोटीन है जो आटे को लचीलापन देता है। और यही प्रोटीन ब्रेड और दूसरे बेकरी प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता के लिए ज़रूरी भी है। कुछ किस्मों में गेहूं को कीड़ों से बचाने वाले प्रोटीन में बढ़ोतरी हुई, और कुछ किस्मों में सीलिएक बीमारी से जुड़े प्रोटीन के हिस्सों में बदलाव पाए गए। हालांकि शोधकर्ताओं ने पाया कि ये बदलाव कैसे और कितने बड़े थे, यह काफ़ी हद तक गेहूं की ख़ास किस्म पर निर्भर करता था।

इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य को देखते हुए गेहूं की ब्रीडिंग पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। गेहूं की ऐसी किस्मों की पहचान करना ज़रूरी है, जो बढ़ते CO₂ कंसंट्रेशन में भी अच्छी बेकिंग क्वालिटी बनाए रखें और जिनमें नुकसानदायक प्रोटीन कम से कम हों। ताकि हमारी रोज़मर्रा की खुराक यानी रोटी पर क्लाइमेट चेंज का प्रभाव सीमित किया जा सके।

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may also like