
मच्छरों को ख़त्म करने के लिए दुनिया भर में, लंबे समय से अल्फा-साइपरमेथ्रिन (α-cypermethrin) जैसे कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
परंतु हाल ही में Frontiers in Tropical Diseases में प्रकाशित एक अध्ययन में, दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पाया कि डेंगी, चिकनगुनिया और ज़ीका जैसी बीमारियां फैलाने वाले एडीज़ एजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छरों पर अब इस कीटनाशक का असर कम हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों के प्रति रेसिस्टेंस के बायोलॉजिकल मेकैनिज्म का अध्ययन करने के लिए, इन मच्छरों पर अल्फा-साइपरमेथ्रिन कीटनाशक का प्रयोग किया। जिससे 97.91% मच्छर तो ख़त्म हो गए, परंतु लगभग 2% मच्छर बच भी गए।
वैज्ञानिकों का कहना है, कि यह इस बात का शुरुआती संकेत है कि इन मच्छरों में धीरे-धीरे इस कीटनाशक के प्रति प्रतिरोध विकसित हो सकता है। दरअसल मच्छरों के शरीर में विषैले पदार्थों के खिलाफ़ ख़ास डिटॉक्सिफ़िकेशन एंज़ाइम्स मौजूद होतेहैं, जो कीटनाशकों का असर कम कर देते हैं।
वैज्ञानिकों ने ऐसे ही 5 एंज़ाइम्स का अध्ययन किया, जिसमें से बीटा-एस्टरेज़ (β-esterase) सबसे ज्यादा ऐक्टिव पाया गया, जिसकी मात्रा इस अध्ययन में 21 गुना से भी ज्यादा बढ़ गई। इसके अलावा CYP450 और GST नाम के एंजाइम भी मच्छरों को कीटनाशकों के असर से बचाने में मदद करते हैं।
हालांकि इस अध्ययन में इस्तेमाल किए गए मच्छरों में कीटनाशक के खिलाफ़ स्थायी प्रतिरोध नहीं पाया गया, परंतु वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रतिरोध की संभावना को ज़रूर दिखाता है।
इसके साथ ही स्थान, मच्छरों की आबादी और कीटनाशकों के उपयोग के चलते, प्रतिरोध का स्तर हर जगह पर अलग हो सकता है। अगर अभी से सही कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ऐसे कीटनाशक मच्छरों के प्रति कम असरदार हो सकते हैं।

